Tuesday, August 7, 2007

दो शब्द


भारतीय मनीषीयों ने मानव मात्र के कल्याण के लिए घोर तप किए । मानव की मानसिक जिज्ञासाओं को शांत करने हेतू ना जाने कितनें कष्ट सह कर आने वाली पीड़ीयों के लिए ज्ञान का अथाह भंडार संग्रहित करते रहे । लेकिन बाहरी आक्रमणों ने हमारे मनीषीयों द्वारा किए गए समस्त ज्ञान को नष्ट करने में कोई कमी नही छोड़ी । आज जो ग्रंथ उपलब्ध हैं वह भी पूर्णतः मौलिक हो, हमें कभी-कभी इस में संदेह होनें लगता है । क्यूँकि आज जो मंत्र-तंत्र-यंत्र के पाए जानें वाले ग्रंथ हैं उन में आपसी तालमेल का काफी अभाव नजर आता है । उन में दी गई विधियाँ आपस में बहुत कम मेल खाती हैं । जिस कारण जिज्ञासुओं का भ्रमित हो जाना स्वाभाविक लगता है । लेकिन फिर भी हमारी परम्पराओं को जीवित रखनें का प्रयास करने वालें साधक व महात्मा लोगो की कमी नही रही । पुराने समय से चली आ रही गूरू-शिष्य परम्पराओ ने आज भी बहुत से ग्रंथों को संजो कर रखा हुआ है । आज भी ऐसे बहुत से ग्रंथ उपल्ब्ध हैं जिन्हें हम जीवित कह सकते हैं । उन्हें प्रमाणिक ग्रंथ माना जा सकता है । यहाँ उन्हीं से संम्बधित जानकारी प्रेषित की जाएगी ।

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